7 ऐसी हिंदी फिल्में जो बॉक्स ऑफिस पर तो फ्लॉप हुईं, लेकिन उनकी कहानी ऑस्कर लेवल की थी
बॉलीवुड में हर साल सैकड़ों फिल्में बनती हैं। कुछ फिल्में करोड़ों की कमाई करके ब्लॉकबस्टर हो जाती हैं, तो कुछ बॉक्स ऑफिस पर औंधे मुंह गिरती हैं। लेकिन क्या कमाई ही किसी फिल्म की क्वालिटी तय करती है? बिल्कुल नहीं। भारतीय सिनेमा के इतिहास में कई ऐसी कल्ट फिल्में रही हैं, जिन्हें रिलीज के वक्त दर्शकों ने नकार दिया, लेकिन उनकी कहानी, स्क्रिप्ट और विजन इतना बेहतरीन था कि उन्हें ऑस्कर की रेस में होना चाहिए था। आइए जानते हैं ऐसी ही 7 बेहतरीन हिंदी फिल्मों के बारे में जो बॉक्स ऑफिस पर फ्लॉप रहीं, लेकिन कंटेंट के मामले में मास्टरपीस थीं।
1. तुम्बाड
साल 2018 में आई 'तुम्बाड' भारतीय सिनेमा की सबसे अनोखी फिल्मों में से एक है। पौराणिक कथा, लालच और हॉरर के मिश्रण से बनी यह फिल्म विजुअली इतनी शानदार थी कि हॉलीवुड की बड़ी फिल्मों को टक्कर दे सकती थी। मेकर्स को इसे बनाने में कई साल लगे, लेकिन रिलीज के समय यह फिल्म आम दर्शकों को सिनेमाघरों तक खींचने में नाकाम रही। आज इस फिल्म को एक कल्ट क्लासिक माना जाता है और इसकी कहानी वाकई ऑस्कर के मंच पर सराहे जाने के काबिल थी।
2. सोनचिड़िया
सुशांत सिंह राजपूत, मनोज बाजपेयी और भूमि पेडनेकर स्टारर यह फिल्म चंबल के बागियों की पृष्ठभूमि पर बनी थी। अभिषेक चौबे के निर्देशन में बनी 'सोनचिड़िया' सिर्फ एक डकैत ड्रामा नहीं था, बल्कि यह इंसान के भीतर छिपे अपराध बोध, मुक्ति और जातिवाद की गहरी परतों को खंगालती थी। कमाल का अभिनय और रोंगटे खड़े कर देने वाले स्क्रीनप्ले के बावजूद, यह फिल्म बॉक्स ऑफिस पर बुरी तरह फ्लॉप साबित हुई।
3. मंटो
नवाजुद्दीन सिद्दीकी अभिनीत और नंदिता दास द्वारा निर्देशित 'मंटो' प्रसिद्ध लेखक सआदत हसन मंटो के जीवन और भारत-पाकिस्तान विभाजन के दर्द को बयां करती है। फिल्म का डायरेक्शन, डायलॉग्स और सिनेमैटोग्राफी बेहद उम्दा थे। यह फिल्म समाज के उस कड़वे सच को दिखाती है जिसे लोग अक्सर देखना नहीं चाहते। यही वजह रही कि गंभीर और ऑस्कर लेवल का कंटेंट होने के बाद भी इसे कमर्शियल सफलता नहीं मिल सकी।
4. तितली
दिल्ली के बैकड्रॉप पर बनी कनु बहल की फिल्म 'तितली' परिवार के काले और डार्क साइड को बिना किसी फिल्टर के सामने रखती है। फिल्म में दिखाया गया है कि कैसे एक इंसान अपने हिंसक परिवार से भागना चाहता है, लेकिन उसी दलदल में फंसता चला जाता है। इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल्स में खूब वाहवाही बटोरने वाली यह फिल्म जब भारत के थिएटर्स में रिलीज हुई, तो डिस्ट्रीब्यूटर्स को अपनी लागत निकालना भी भारी पड़ गया था।
5. भवेश जोशी सुपरहीरो
विक्रमादित्य मोटवाने की यह फिल्म भारत की सबसे रियलिस्टिक और बेहतरीन सुपरहीरो फिल्मों में से एक है। हर्षवर्धन कपूर स्टारर यह फिल्म बिना किसी जादुई शक्तियों के, सिस्टम के भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ने वाले आम युवाओं की कहानी थी। फिल्म की स्क्रिप्टिंग, डार्क टोन और बैकग्राउंड स्कोर कमाल का था। खराब कूपन और कमजोर प्रमोशन के कारण यह फिल्म थिएटर्स में फ्लॉप हो गई, लेकिन आज ओटीटी पर लोग इसकी कहानी के दीवाने हैं।
6. डिटेक्टिव ब्योमकेश बक्शी
दिबाकर बनर्जी के निर्देशन में बनी सुशांत सिंह राजपूत की इस फिल्म ने 1940 के दशक के कलकत्ता को परदे पर जीवंत कर दिया था। वर्ल्ड वॉर 2 के समय की पॉलिटिक्स, ड्रग्स सिंडिकेट और एक मर्डर मिस्ट्री को जिस तरह इस फिल्म में बुना गया था, वह हॉलीवुड की बेहतरीन मिस्ट्री थ्रिलर फिल्मों के स्तर का था। फिल्म की धीमी रफ्तार के कारण उस वक्त के दर्शकों को यह पसंद नहीं आई और यह फ्लॉप लिस्ट में शामिल हो गई।
7. अलीगढ़
हंसल मेहता की फिल्म 'अलीगढ़' प्रोफेसर रामचंद्र सिरस के जीवन की वास्तविक घटना पर आधारित थी। मनोज बाजपेयी और राजकुमार राव के अभिनय से सजी यह फिल्म अकेलेपन, प्राइवेसी के हनन और समाज के दोहरे रवैये पर एक गहरी चोट करती है। फिल्म की संवेदनशीलता और भावनाओं को जिस तरह परदे पर उतारा गया, वह अंतरराष्ट्रीय स्तर की सिनेमाई कला थी, लेकिन कमर्शियल सिनेमा के शौकीनों के बीच यह फिल्म बॉक्स ऑफिस पर दम तोड़ गई।
निष्कर्ष: ये सातों फिल्में इस बात का सबूत हैं कि बॉक्स ऑफिस का कलेक्शन कभी भी किसी कहानी की असली ताकत को नहीं माप सकता। इन फिल्मों ने भले ही सिनेमाघरों में नोट न छापे हों, लेकिन इन्होंने सिनेमा प्रेमियों के दिलों में और भारतीय फिल्म इतिहास में अपनी एक अमर जगह बना ली है।
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